गुरुद्वार

श्री योगी गोरक्षनाथ बाबा

      श्री योगी गोरक्ष नाथ

श्री योगी गोरक्ष नाथ बाबाजी योग ध्यान और समस्त विद्या के जनक रूप में उनका नाम सबसे आगे मिलाता गोरख नाथजी ने  पञ्च तत्व बने शरीरके इन्द्रियों को अपने वश में कर ध्यान योग में महारत हासिल कर ली है और मानव प्रकृति ,कामुकता, क्रोध अहंकार, लालच ,मायामोहित लगाव को  नाश कर ध्यान का रास्ता सुकर किया

     योगी गोरक्ष नाथ

ओंकार ब्रम्ह गोरख मछेंद्र दात्तात्रयाय नमः

ब्रम्हरुपाय आत्म्ज्योतिस्वरुपाय शिद्धाय नमः

आदिनाय  परमकृपाय नव नाथाय नमो नमः

कोटि कोटि विद्या के धनि गोरखानाथाय नमः

समस्त विद्या के  स्वामी श्री योगी गोरखनाथ बाबा आप हरिनारायण अवतार –अवतारी पूर्ण ब्रम्ह हो आप के गुरु पूर्ण तपी जपी कवी नारायण अवतार मछेंद्र नाथजी है उनके गुरु ब्रम्ह्हा विष्णु महेष जो समस्त सृष्टि के रूप में येकोहं एको देवाः जन्म जीवन मृत्यु के अधिपति है तीनो देवो के एकरूप अवतार सिद्ध सिद्धेश्वर श्री दत्तात्रय मुनि सम्पूर्ण ग्यान के धनि है

 आदिनाथ गुरु कोटि सिधाः

मछेन्द्र उनके प्राण सिधः

 मछेन्द्र चेला गोरख ग्यानी

जन्म अयोनि संभव योनी

 गुरुगोरखबानी
गुरु गोरखनाथजी :- बच्चा  ध्यान का अर्थ अपना लक्ष निच्चित करना साथमे देवताका चयन करना के नुरूप मन्त्र को प्राप्त करना मुद्रा को समजना एवं मात्रा ,माला,गिनती ,समय, प्राप्ति हेतु याम नियम एवं त्याग को समजना जरुरी है और उसके लिए ग्यानी गुरु होना चाहिए

        “गुरु बिन न रही बा “

बिन गुरु सत्संग न होई /कोण बे ग्यान बिज बोई

बिन गुरु दिन रात अधूरी /राजा होवे मन भिकारी
ध्यान करे ध्यान गुरुका /श्याप मिटे रे तय मनका

ज्ञानको गुरु ग्यानी दानी /ध्यान सफल होवे रे प्राणी

ध्यान के  प्राप्ति की अगली सीडी की दूसरी कड़ी है उसका नाम धारना  

धारना

गुरु गोरखनाथजी :-बच्चा अब धारना  को समाजो किसी के रूप, रंग, वाणी, विचार ,चाल, चलन ,चाल ,चलन ,धनवान प्रति आकर्षित होना अपने आपमे मनोधारण वश होना इसी प्रकार मनोधारित वश प्रेरित देवता पर प्रेरणा लक्ष को कबुल हो और उसके प्रति कोई मनमे शक ना हो उस स्तीतिको धारना कहते है

सच सच पिबत रस पिबे /सत्य वचन को धारण किबे

धारना  होई मनोधारिका  / सत  वचन रे बच्चा सच्चा

 साधना

गुरु गोरखनाथ, योग सिद्धिके अग्रणी सिद्ध  अपनी साधना को शत चक्र आयामी रूप में प्रगट कर धर्म एवं जनमानस को प्राप्ति हेतु प्रगट किया

धारना  ,विस्वास पूर्णतः किसी भगवान ,गुरु ,श्रद्येय विचारोपे आ जाता और उसके प्रति मनमे कुचभी संदेह नहीं रहता .गुरुसे ग्यानसे  साधना के नियमोको समज के उस दिशा में आपने प्राप्ति के और निकलना साधना कि सीडी  है

  दिए ग्यान पे चले गुसाई /ग्यान बिज्यो धर गुरुमाई

  दिए बीजो तर चाल चलाई/ गुरु कहे तब धारना होई/// 

अपने पूरे जीवन शैली इस तरह में परिवर्तित हो जाता है, कि आप अपने आप के बाद यम और  आवश्यक नियमों और नियमाव्चित आचरण का हो

शुरू. योग के इन छह पहलू हैं:

शारीरिक मुद्राओं
प्राणायाम
प्रत्याहार
धारणा
ध्यान
समाधि

2. नाथ पंथ के अनुसार यह सबसे महत्वपूर्ण है कि है कि आकांक्षी उसके शरीर को अंतर बाह्य शुद्ध पूरी तरह से करना चाहिए.. महत्वपूर्ण और महत्वपूर्ण शरीर के अंगों का एक कुल मलिन मुक्ति  शोधन के बाद आकांक्षी एक स्थिति स्तिर गति हो जाय तब योग के सभी चरणों का कार्य करने के लिए. आप स्वगत पूरी तरहसे योग्य हो

3. अगले कोख  में शारीरिक मुद्राओं महत्त्व है. सभी महत्वपूर्ण आसन सीखने के बाद, प्राप्तकर्ता के लिए सबसे आवश्यक आसन है. सिद्धासन या वज्रासन. सभी साधना  के लिए महत्वपूर्ण आसन माना जाता है. यदि आपको इन आसनका प्रयोग करना नहीं आता तो  आप की तरह किसी भी सुविधाजनक आसन में बैठ सकते हैं